• साध्यरूप योग (प्रेम) ही पूर्ण योग है
    साध्यरूप योग (प्रेम) ही पूर्ण योग है
  •  स्नेह की एकता से संघर्ष का नाश होता है
    स्नेह की एकता से संघर्ष का नाश होता है
  • मेरा कुछ नहीं है, मुझे कुछ नहीं चाहिए, मैं कुछ नहीं हूँ, सर्वसमर्थ प्रभु ही मेरे अपने हैं
    मेरा कुछ नहीं है, मुझे कुछ नहीं चाहिए, मैं कुछ नहीं हूँ, सर्वसमर्थ प्रभु ही मेरे अपने हैं
  • शारीर विश्व के काम आ जाए, अहं अभिमान-शून्य ही जाए, ह्रदय प्रभु-प्रेम से भर जाए
    शारीर विश्व के काम आ जाए, अहं अभिमान-शून्य ही जाए, ह्रदय प्रभु-प्रेम से भर जाए
  • कोई और नहीं, कोई गैर नहीं
    कोई और नहीं, कोई गैर नहीं
  • स्नेह की एकता से संघर्ष का नाश होता है
    स्नेह की एकता से संघर्ष का नाश होता है
  • साधन युक्त जीवन ही मानव जीवन है
    साधन युक्त जीवन ही मानव जीवन है
  • मानवता में ही पूर्णता निहित है
    मानवता में ही पूर्णता निहित है
☀ आत्म-निरीक्षण, अर्थात्‌ प्राप्त विवेक के प्रकाश में अपने दोषों को देखना।☀ Introspection, ie., to see one’s own flaws in light of the received conscience.। ☀ की हुई भूल को पुन: न दोहराने का व्रत लेकर, सरल विश्वासपूर्वक प्रार्थना करना। ☀ Taking the oath of not repeating an already committed mistake, to pray with simple faith.। ☀ विचार का प्रयोग अपने पर और विश्वास का दूसरों पर, अर्थात्‌ न्याय अपने पर और प्रेम तथा क्षमा अन्य पर। ☀ To apply discrimination (judgement) for oneself and faith for others, ie., apply justice for oneself, and love and forgiveness for others.। ☀ जितेन्द्रियता, सेवा, भगवच्चिन्तन और सत्य की खोज द्वारा अपना निर्माण। ☀ One’s own development through control over senses, service, remembrance of God, and search for truth.। ☀ दूसरों के कर्तव्य को अपना अधिकार, दूसरों की उदारता को अपना गुण और दूसरों की निर्बलता को अपना बल, न मानना। ☀ Not considering others’ duties as one’s own right, others’ magnanimity as one’s own goodness, and others’ weakness as one’s own strength.। ☀ पारिवारिक तथा जातीय सम्बन्ध न होते हुए भी, पारिवारिक भावना के अनुरुप ही पारस्परिक सम्बोधन तथा सद्भाव, अर्थात्‌ कर्म की भिन्नता होने पर भी स्नेह की एकता। ☀ Despite having no family or societal relation, to have mutual interaction and benevolence in accordance with the sentiment of family, ie., unity (universality) of love despite the diversity of action.। ☀ निकटवर्ती जन-समाज की यथाशक्ति क्रियात्मक रुप से सेवा करना। ☀ To serve the proximate people, as far as possible, through actions.। ☀ शारीरिक हित की दृष्टि से आहार-विहा‌र में संयम तथा दैनिक कार्यों में स्वावलम्बन। ☀ From the viewpoint of physical benefit, to practice restraint in eating and lifestyle habits, and self-dependence in daily chores.। ☀ शरीर श्रमी, मन संयमी, बुद्धि विवेकवती, हृदय अनुरागी तथा अहम्‌ को अभिमान शून्य करके अपने को सुन्दर बनाना। ☀ Making the body hard-working, the mind restrained, the intellect conscientious, the heart loving, and the ego pride-less to beautify oneself.। ☀ सिक्के से वस्तु, वस्तु से व्यक्ति, व्यक्ति से विवेक तथा विवेक से सत्य को अधिक महत्व देना। ☀ To consider the objects as more important than money, the people as more important than objects, the conscience as more important than people, and the Truth as more important than conscience.। ☀ व्यर्थ-चिन्तन-त्याग तथा वर्तमान के सदुपयोग द्वारा भविष्य को उज्जवल बनाना। ☀ To brighten the future by giving up useless-worrying, and by properly utilizing the present.।

प्रार्थना

‘प्रार्थना’ आस्तिक प्राणी का जीवन है।

मेरे नाथ !
आप अपनी सुधामयी, सर्व समर्थ, पतितपावनी, अहैतुकी कृपा से, दु:खी प्राणियों के हृदय में, त्याग का बल एवं सुखी प्राणियोंके हृदय में, सेवा का बल प्रदान करें; जिससे वे सुख-दु:ख के बन्धन से मुक्त हो, आपके पवित्र प्रेम का आस्वादन कर, कृत्कृत्य हो जाएँ।

ॐ आनन्द ! ॐ आनन्द !
ॐ आनन्द !

ब्रह्मलीन पूज्यपाद स्वामी श्री शरणानन्दजी महाराज के उद्गार

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जिस शरीर से तुम प्यार करते हो उसका एक बाह्य स्वरूप और है जिसका नाम है “मानव सेवा संघ” जो एक मात्र मानव दर्शन तथा जीवन विज्ञान से सिद्ध है। उसकी जितनी चाहो सेवा करो। अनेक शारीर नाश हो जायेंगे पर वह बना रहेगा। अर्थात् मानव सेवा संघ की यथेष्ट सेवा ही शरणानन्द की सेवा है। जिन्होंने ‘मानव सेवा संघ’ के प्रकाश को अपनाया वह सभी “शरणानन्द” से अभिन्न हो गये। शरणानन्द का अर्थ है- मानव सेवा संघ। इसके प्रति जिसकी श्रद्धा है, उसका मैं ॠणी हूँ।

प्रार्थना

‘प्रार्थना’ आस्तिक प्राणी का जीवन है।

मेरे नाथ,

आप अपनी सुधामयी, सर्व समर्थ, पतितपावनी, अहैतुकी कृपा से मानव मात्र को विवेक का आदर तथा बल का सदुपयोग करने की सामर्थ्य प्रदान करें एवं हे करुणा सागर ! अपनी अपार करुणा से शीघ्र ही राग-द्वेश का नाश करें। सभी का जीवन सेवा-त्याग-प्रेम से परिपूर्ण हो जाए।

ॐ आनन्द ! ॐ आनन्द ! ॐ आनन्द !

ब्रह्मलीन पूज्यपाद स्वामी श्री शरणानन्दजी महाराज (Pujayapad Swami Sharnanandji Maharaj)

ब्रह्मलीन स्वामी शरणानन्द जी महाराज एक महान् क्रान्तदर्शी, तत्वेत्ता, भगवद् भक्त एवं मानवता के संरक्षक सन्त थे। उनका आविर्भाव २०वीं शती के प्रारम्भ में उत्तर भारत में हुआ। बचपन में ही लगभग दस वर्ष की अल्पावस्था में ही उनकी नेत्र-ज्योति चली गई। इस दुखद घटना से उनका सारा परिवार अथाह दुःख में डूब गया, किन्तु उस छोटे-से बालक के मन में एक प्रश्न उत्पन्न हुआ कि “क्या कोई ऐसा भी सुख है जिसमें दुःख शामिल न हो।” उत्तर मिला-ऐसा सुख तो साधु-सन्तों को प्राप्त होता है, जिसमें दुःख सम्मिलित नहीं रहता। इस उत्तर से उन्हें जीवन कि राह मिल गई। इन्होंने निश्चय कर लिया कि मैं साधु हो जाऊँगा। उनके सद्गुरु रुप सन्त ने परामर्श दिया कि ईश्वर के शरणागत हो जाओ। इनके बाल्यकाल के कोमल हृदय पर सन्त कि वाणी का बड़ा गहरा प्रभाव पड़ा, और इन्होंने ईश्वर की शरणागति स्वीकार कर लिया। ईश्वर की शरणागति स्वीकार करते ही इनके मन में प्रभु-मिलन की तीव्र अभिलाषा जाग्रत हो गई। उस अभिलाषा ने संसार और शरीर के सभी बन्धनों को ढीला कर दिया और उन्नीस वर्ष की अल्पायु में ही इन्होंने विधिवत् संन्यास ले लिया।

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स्वामी श्री शरणानन्दजी महाराज पुस्तकों में अपना नाम तथा चित्र प्रकाशित करने के लिए कभी अनुमति नहीं देते थे। परंतु देश, काल, परिस्थिति परिवर्तन तथा कुछ व्यावहारिक कारणों से इस वेबसाइट में उनका नाम तथा चित्र दिया गया है।

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