करने में सावधान और होने में प्रसन्न रहना

Comments Off on करने में सावधान और होने में प्रसन्न रहना 421
  • मानव जीवन में कार्यक्षमता ‘किसी’ कि दी हुई है, और ‘उसी’ ने विवेक का प्रकाश दिया है | अतः कार्यक्षमता का सदुपयोग बड़ी ही सावधानी से विवेक के प्रकाश में देखकर करना चाहिए |
  • प्रवृत्ति का सम्बन्ध समूह से है | सामूहिक सहयोग के बिना किसी भी कार्य का सम्पादन सम्भव नहीं है | समाज का प्रत्येक व्यक्ति यदि अपने अपने कार्य को सावधानीपूर्वक करता रहे तो सहज ही सामाजिक अव्यवस्था मिट जाए और सारा समूह ही उन्नतिशील ही जाए |
  • जो कर्ता अपने लक्ष्य को जाने बिना कार्य में प्रवृत्त होता है उसकी प्रवृत्ति सावधानीपूर्वक नहीं होती है | वर्तमान को असावधानी कालान्तर में बहुत ही दुःखद फल उत्पन्न करने वाली बन जाती है | इससे मुक्त रहने के लिए कर्ता को वर्तमान में प्रत्येक प्रवृत्ति को करने में सावधान होना अनिवार्य है |
  • सही प्रवृति के फलस्वरूप कर्तव्यनिष्ठ व्यक्ति में सहज निवृत्ति कि शान्ति अभिव्यक्त होती है | अतः साधक के लिए प्रत्येक प्रवृत्ति को राग-निवृत्ति का साधन मानकर सावधानीपूर्वक सम्पन्न करना चाहिये | राग-निवृत्ति कि शान्ति में ही योग, बोध व प्रेम की अभिव्यक्ति होती है, और इसी में जीवन की पूर्णता है |

सृष्टि में जो कुछ हो रहा है, वह सृष्टिकर्त्ता के विधान के अनुसार हो रहा है | इस तथ्य पर दृष्टि जाते ही ‘जो हो रहा है’ वह स्वाभाविक लगने लगता है, और मंगलमय प्रभु का विधान मानकर उसमें प्रसन्न रहने लगता है |  

Similar articles

Prayer & Kirtan

Subscribe SANT VANI