जीवन-दर्शन.

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जिस प्रकार सोये हुए को जगाया जा सकता है, पर जो जागते हुए सो रहा है उसे कोई नहीं जगा सकता; उसी प्रकार जो अपनी जानकारी का स्वयं आदर नहीं करता और प्राप्त बल का सदुपयोग नहीं करता, उसकी कोई भी सहायता नहीं कर सकता। क्योंकि प्राकृतिक नियम के अनुसार विवेक के अनादर से अविवेक की और बल के दरुपयोग से निर्बलता की ही वृद्धि होती है। ज्यों-ज्यों प्राणी विवेक का अनादर तथा बल का दुरूपयोग करता जाता है, त्यों-त्यों विवेक में धुंधलापन और निर्बलता उत्तरोतर   बढती ही रहती है। यहाँ तक की विवेकयुक्त जीवन छिन्न-भिन्न  हो जाता है और प्राणी साधन करने के योग्य नहीं रहता।(जीवन-दर्शन भाग-२)

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