प्रश्न- कभी तो ऐसा मालूम होता है कि हॄदय में प्रेम है और कभी ऐसा मालूम होता है कि हॄदय सूना-सा है, प्रेम नहीं है। यह क्या है?

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उत्तर- स्वयं साक्षी बनकर मनके गुण-दोषों को देखना, विश्वास और प्रेम का बार-बार निरीक्षण करना, यह प्रेममार्ग की साधना नहीं है। साक्षी-भाव से यह देखना कि गुण ही गुणों में बर्त रहे हैं, यह तो विचारमार्ग की साधना है। विश्वास और प्रेम की खोज करना तो वैसी ही गलती है जैसे कोई बीज बोकर उसे खोद-खोदकर देखे कि यह उपजा या नहीं। अत: साधक को चाहिये कि प्रभु को अपना समझे, उनपर दृढ़-विश्वास करे, विश्वास में विकल्प न आने दे। शरीर, मन, इन्द्रियों और बुद्धिको तथा अपने-आपको पूर्णतया भगवान्‌ के समर्पण करके सब प्रकार से उनपर निर्भर हो जाय।

आश्चर्य की बात तो यह है कि मनुष्य संसारपर जितना भरोसा करता है, उतना भगवान्‌ पर नहीं करता। जैसे कहीं जानेवाला मुसाफिर पहले से सीट रिजर्व करा लेता है, तो उसको यह भरोसा रहता है कि ठीक समय पर पर सीट जरुर मिल जायगी। अत: वह निश्चिन्त हो जाता है, यद्द्यपि उसमें अनेकों विघ्न भी आ सकते हैं। विघ्न असम्भव नहीं है, तो भी उसपर भरोसा कर लेता है। संसारपर भरोसा करके बहुत बार धोखा खाया है एवं भगवान्‌ पर भरोसा करनेवाले को कभी धोखा नहीं हुआ। यह मानते हुए भी मनुष्य भगवान्‌ पर निर्भर नहीं होता, इससे बढ़कर दु:ख और आश्चर्य क्या होगा?

मनुष्य स्वयं अलग रहकर अपने मन, बुद्धि और इन्द्रियोंको भगवान्‌ में लगाना चाहता है, यहाँसे ही गलती होती है। प्रेमका सम्बन्ध साधकसे है न कि उसके मन, इन्द्रिय और बुद्धिसे। प्रेममार्ग में चलनेवाला पहले तो अपनेको अपने प्रियतम के प्रेमकी लालसा और बादमें प्रेम समझता है, प्रेमी प्रेममें विलीन हो जाता है। प्रेम और प्रेमीमें भिन्नता नहीं रहती। अत: प्रेम मार्ग के साधक के जीवनमें भगवान्‌ का प्रेम, भरोसा और कृपा सदा सजीव बने रहने चाहिये, भावकी शिथिलता नहीं होनी चाहिये।

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