प्रश्न- भगवान्‌ हमसे प्रेम करते हैं, यह कैसे मालूम हो? 

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उत्तर- भगवान्‌ पर विश्वास हो और उनसे हमारा सम्बन्ध हो तब मालूम हो सकता है। जैसे माता अपने बच्चे के लिए तरसती है, वैसे ही भगवान्‌ अपने भक्त के लिए तरसते हैं। बच्चा काला-कलूटा, गूँगा-बहरा, लूला-लँगड़ा कैसा भी हो, माता उससे प्रेम करती है। बच्चा भी यह बात समझता है। भगवान्‌ में तो माता से अनेक गुना वात्सल्य है। फिर वे भक्त से प्रेम करें, इसमें कहना ही क्या ।

अत: जो एकमात्र भगवान्‌ को ही मानते हैं, उनको भगवान्‌ का प्रेम मिलता है। इसमें सन्देह नहीं है। यह भक्तों का अनुभव है। ईश्वर प्रेमीभक्त को ढूँढ़ता है। विचारशील साधक ईश्वर को ढूँढ़ता है।

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