मानवता में ही पूर्णता निहित है.

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मानवता मानवमात्र में बीजरूप में विद्यमान है | उसे विकिसित करने की स्वाधीनता अनन्त के मंगलमय विधान से सभी को प्राप्त है | मानवता किसी परिस्थिति-विशेष की ही वास्तु नहीं है | उसकी उपलब्धि सभी परिस्थितियों में हो सकती है | उसकी माँग अपने लिए, जगत के लिए एवं अनन्त के लिए अत्यन्त आवश्यक है, क्योंकि मानवता में ही पूर्णता निहित है |

विवेक-विरोधी कर्म का त्याग, अर्थात् कर्त्तव्य-परायणता, विवेक-विरोधी सम्बन्ध का त्याग, अर्थात् असंगता और विवेक-विरोधी विश्वास का त्याग, अर्थात् उसमें अविचल श्रद्धा जो इन्द्रिय-ज्ञान तथा बुद्धि-ज्ञान का विषय नहीं है-यही मानवता का चित्र है | कर्त्तव्य-परायणता आ जाने से मानव-जीवन जगत् के लिए, असंगता प्राप्त होने से जीवन अपने लिए और अविचल श्रद्धापूर्वक आत्मीयता स्वीकार करने से जीवन अनन्त के उपोगी सिद्ध होता है | इस दृष्टि  से यह निर्विवाद है की मानवता सभी की माँग है |

यह सभी को मान्य होगा कि विवेकयुक्त जीवन ही मानव-जीवन है | इस कारण विद्यमान मानवता को विकसित करने के लिए विवेक-विरोधी कर्म, सम्बन्ध तथा विश्वास का त्याग करना अनिवार्य है | उसे बिना किये अमानवता का अन्त हो ही नहीं सकता | अमानव को पशु कहना पशु की निन्दा है, क्योंकि अमानवता पशुता से भी बहुत नीची है और मानव को देवता कहना मानव की निन्दा है, क्योंकि मानवतायुक्त मानव देवता से बहुत ऊँचा है, अथवा यों कहो कि मानवता देवत्व से बहुत ऊँची है और अमानवता पशुता से बहुत नीची | इस दृष्टि से अमानवता का मानव-जीवन में कोई स्थान नहीं है | अमानवता के नाश में ही मानवता निहित है |

निज विवेक के आदर में ही अमानवता का अन्त है | अतः विद्यमान मानवता को विकसित करने में प्रत्येक वर्ग, समाज और देश का व्यक्ति सर्वदा स्वाधीन है | मानवता किसी मत, सम्प्रदाय तथा वाद विशेष की ही वास्तु नहीं है, अपितु वह सभी को सफलता प्रदान करने वाली अनुपम विभूति है | कर्त्तव्यपरायणता, असंगता एवं आत्मीयता मानवता के बाह्यचित्र हैं और योग, बोध तथा प्रेम मानवता का अन्तरंग स्वरुप है | योग में सामर्थ्य, बोध में अमरत्व और प्रेम में अनन्त रस निहित है | सामर्थ्य, बोध, अमरत्व और अनन्त रस की माँग ही मानव की माँग है | इस दृष्टि से मानवता में ही पूर्णता निहित है |

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